श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 73
निज ब्रजधाम लेहु नँदरानी, हम कहुँ अंत बसेंगी जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nija braja-dhāma lehu naṁdarānī, hama kahuṁ anta baseṁgī jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1निज ब्रजधाम लेहु नँदरानी, हम कहुँ अंत बसेंगी जाय।
2अति खोटा यह तुम्हरो ढोटा, नेकहुँ नाहिं लजाय।
3हम भोरी गोरिन सों नित यह, बरबस रार मचाय।
4छींकेहूँ ते खात काढ़ि दधि, भाजन फोरि गिराय।
5छोटो सो मत जान यशोदा, हाल बड़ो ह्वै जाय।
6मग रोकत अरु कहत गूजरी!, हम ब्रजराज कहाय।
7दै दधि-दान जाहु अब आगे, नाहिं तो जान न पाय।
8जो हौं कहौं कंस पै कहिहौं, खोटी खरी सुनाय।
9मटुकी फोरि खाय दधि छलिया, चितवन चोट चलाय।
10मोको घायल करि बेदरदी, मंद मंद मुसकाय।
11वशीकरन जादू चेटक सब, यह तो जाने माय।
12तू याको बरजति नहिं नेकहुँ, बहुतै लाड़ लड़ाय।
13को “कृपालु” बसि जादू नगरी, तन मन प्राण गमाय॥
हिन्दी भावार्थ
(गोपियाँ श्रीकृष्ण के ऊधमों से तंग आकर यशोत से कहती हैं।) हे यशोदाजी! तुम अपना ब्रजधाम अपने ही पास रखो अब हमें इस ब्रज में नहीं रहना है। हम तो जाकर कहीं औ बस जायेंगी, क्योंकि तुम्हारा यह लाला देखने में तो बहुत ही छोटा है किन्तु यह इतना खोटा है कि हम भोली-भाली गोपियों से सदा ही हठात् ऊधम करने में थोड़ा भी नहीं लजाता। हम लोग इससे अत्यधिक तंग हो चुकी हैं। यह छींके पर भी रखे हुए दही को निकालकर चट कर जाता है तथा उस मरकी को ही गिराकर फोड़ डालता है। तुम इसे सदा छोटा ही समझती हो, पर यह ऐसा मायावी है कि तुरन्त ही बड़ा भी हो जाता है। जब मैं दही बेचने जाती हूँ तब यह मेरा मार्ग रोक कर खड़ा हो जाता है और कहता है, 'ओ गूजरी! हम इस ब्रज के राजा हैं हमें दही का दान देकर ही आगे जा सकती हो, अन्यथा जाने नहीं पाओगी।'इस पर जब मैं कहती हूँ कि मैं अभी जाकर कंस से कह दूँगी, तब मुझे खरी-खोरी बातें सुनाने लगता है एवं मेरा दही खाकर मटकी फोड़ डालता है। इतना ही नहीं वरन् इसके पश्चात् अपनी आँखों के कटाक्षों से मुझे घायल कर देता है। फिर यह निष्ठुर मुझे घायल देखकर मंद-मंद मुस्कराता है। अरी सखि! यह उच्चाटन, मोहन आदि सभी जादू, तंत्र, मंत्र जानता है। 'कृपालु' कहते हैं कि हे यशोदा! तू अपने लाला को इन ऊधमों से जरा भी नहीं रोकती, वरन् और भी लाड़ करती है जिससे इसका मन और भी बढ़ता जाता है। ऐसी जादू की नगरी में रहकर भला कौन अपना तन, मन, प्राण गँवाना चाहेगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 333-334