श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 72
दधि को एकहुँ बूँद न देइहौं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dadhi ko ekahuṁ būṁda na deihauṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दधि को एकहुँ बूँद न देइहौं।
2हौं हौं भूप भानु की बेटी, नहिं निज आन घटैहौं।
3अति की कीन लंगरई अब लौं, अब हौं मजा चखैहौं।
4जोरि एक की सात मात ते, पुनि ऊखल बँधवैहौं।
5जो यशुमतिहूँ सो बचि जैहौ, बंदीगृह पठवैहौं।
6हँसि “कृपालु” हरि कह सखि! पुनि हौँ माया करि भजि जैहौं॥
हिन्दी भावार्थ
दही के दान माँगने वाले मदनमोहन से किशोरी जी कहती हैं कि मैं तुम्हें दही की एक बूँद भी नहीं दूँगी। तुम नहीं जानते कि मैं वृषभानु भूप की बेटी हूँ, तुम्हें दान देकर अपने राजकुल की प्रतिष्ठा में बट्टा नहीं लगने दूँगी। तुमने अब तक अतिशय ऊधम किया है, अब मैं तुम्हें भली भाँति मज़ा चखाउँगी। अभी जाकर तुम्हारी मैया से एक की सात जोड़कर कहूँगी एवं तुम्हें पुनः ऊखल में बँधवाऊँगी। यदि किसी प्रकार यशोदा मैया से भी बच गये तो बाबा वृषभानु से कह कर ठ (कंस की जेल) में भिजवा दूँगी। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर हँस कर कहते हैं अरी सखि! मुझे जेल की धौंस क्यों दिखा रही है, मैं तो जन्म लेते ही अपनी माया के द्वारा जेल से भाग चुका हूँ, अतएव उसी प्रकार माया करके पुनः भाग आऊँगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 332-333