श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 71
ढाँपि मुख कामरि रूठे लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ḍhāṁpi mukha, kāmari rūṭhe lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ढाँपि मुख कामरि रूठे लाल।
2उठहु लाल बेला गोचारण, द्वार टेरि रहे ग्वाल।
3कैसेहुँ उठत न, उठत, न बोलत, रिस भौंहन बल भाल।
4"बात कही किन कहा?"मातु कह, उठि बोले ततकाल।
5"सुनु मैया! मोते कह भैया", इमि कहि रुदत गुपाल।
6बिनु पितु मातु आपु कह मो कहँ, हँसत ग्वाल दै ताल।
7बाबा तोहिं परो पायो कहुँ, कहँ लौं कहौं कुचाल।
8तू मैया! मुसकाति बात सुनि, है यामे कछु जाल।
9जो जस होत “कृपालु” कहत तस, यशुमति कह सुनु लाल॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर प्रातः काल होने पर भी आज नहीं उठे एवं अपने मुख को काले कंबल से ढाँककर रूठे हुए लेटे हैं। मैया कहती है, "अरे लाला! गया। शीघ्र उठ, देख तो ग्वाल बाल द्वार पर खड़े तुझे पुकारते हुए प्रतीक्षा कर रहे हैं। भी नहीं उठे, बड़ी देर बाद जब उठे भी, तब भी रूठने का कारण नहीं बताया। भौहों के बीच में बल पड़े हुए हैं तथा अत्यन्त ही क्रुद्ध हैं। तब मैया ने कहा, 'अरे लाला! सही तुझसे किसने क्या कहा है? बोल पड़े, 'अरी मैया! ही कहकर श्यामसुन्दर हिचकियाँ भर- भरकर रोने लगे। देर बाद श्रीकृष्ण ने कहा, 'मेरी मैया! कहते हैं कि तेरे तो माता-पिता ही नहीं हैं एवं यह सुनकर सभी ग्वालबाल हँसते हुए ताली बजाते हैं। मैया! भैया कहते हैं कि अरे कन्हैया! हुआ पाया है। मैं उनकी कुचालों को कहाँ तक कहूँ? मैया! भी मेरी बात सुनकर मुस्कराती है जिससे मुझे और भी शंका होती है। अवश्य कुछ-न-कुछ बात है। कि तब यशोदा ने कहा, "अरे लाला! सबको वैसा ही समझता है। कि बलराम को ही बाबा ने पड़ा हुआ पाया है, तुझको नहीं। दूसरा अभिप्राय यह है कि, 'अरे लाला! है कि मैया इसमें कुछ-न-कुछ अवश्य जाल है, तो तू सदा ही योगमाया से युक्त जाल किया करता है, अतएव मुझे भी वैसा ही समझता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 331-332