श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 70
डगर महँ झगरि लँगर कर रार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ḍagara mahaṁ, jhagari laṁgara kara rāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1डगर महँ झगरि लँगर कर रार।
2मटुकी फोर तोर लर हारन, चुनरी शीश उतार।
3जितनोइ छोट खोट सखि तितनोइ, हारीं सब ब्रजनार।
4"तुम मोरी", इमि कहि सुनु गोरी, करत दृगन सों वार।
5निधरक कहत नेकु चलु कुंजनि, लंपट नर अनुहार।
6हौं “कृपालु” नहिं जाति लाज ते, मन चहत रिझवार॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखि, एक सखि से श्रीकृष्ण के ऊधमों से तंग आकर कहती है।) हे सखि! वह ऊधमी श्यामसुन्दर मार्ग में छेड़कर मुझसे ऊटपटांग ढंग से ऊधम करता है। मेरी मटुकी को फोड़कर मोतियों की लड़ एवं हारों को तोड़ डालता है तथा मेरे सिर से चुनरी उतारकर फेंक देता है। अरी सखि! वह जितना छोटा है उतना ही खोटा है। उससे समस्त ब्रज-गोपिकायें हार चुकी हैं। ह मुझसे 'तुम मोरी (प्यारी)'ऐसा कहकर, अरी सखि! अपनी आँखों से कटाक्षपात करता है। मुझसे बेधड़क कहता, "जरा कुंजों की ओर चलो ', जैसे कोई लम्पट व्यक्ति कहे। कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! यद्यपि लोक-लाज के द है कारण मैं उसके कथनानुसार नहीं जाती, फिर भी हृदय तो चाहता ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 330-331