# निरत कर आजु ब्रह्म साकार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0342-M07-K074
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 74
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 160–160

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>निरत कर आजु ब्रह्म साकार।  
<a id="line-2"></a>दै करताल मातु यशुमति-सँग, पग नूपुर झनकार।  
<a id="line-3"></a>झिंगुली झीन छीन कटि किंकिनि, मोर पंख सिर धार।  
<a id="line-4"></a>गोपद रज राजित तनु अलकनि, उरझि रहीं घुँघरार।  
<a id="line-5"></a>तुतरिन बतियन कहि कछु गुन गुन, पुनि पुनि कर किलकार।  
<a id="line-6"></a>लखिय “कृपालु” ब्रह्म-गति जेहि कह, माया गुन गो पार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

यशोदा के आँगन में वेदान्त के साकार सच्चिदानंद श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। आज साकार-ब्रह्म नंदलाल बनकर मैया यशोदा के हाथ की तालिका-ध्वनि के संकेत पर नाच रहा है। पैरों में नूपुरे की मधुर ध्वनि हो रही है। वे श्रीकृष्ण बड़ी ही बारीक झिंगुली पहने हुए हैं एवं पतली-सी कमर में किंकिणी तथा सिर पः मोर का पंख धारण किये हैं, उनका सारा शरीर गायों के खुः के नीचे से निकली हुई धूल से सफेद हो रहा है। घुंघराले बाल उलझे हुए अत्यन्त ही मन को मोहित कर रहे हैं। तोतली भाष में कुछ गुनगुनाकर गाते हुए बार-बार किलकारियाँ भी माः रहे हैं। 'कृपालु'ज्ञानियों की ओर संकेत करके कहते है कि हे ज्ञानियों! मैं अधिक कुछ भी शाब्दिक शास्त्रार्थ करन उचित नहीं समझता। तुम लोग स्वयं चलकर अपने ब्रह्म क दशा देख लो, जिसे तुम माया एवं तीनों गुण इन्द्रियों से प कहते हो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 334-335

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
