श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 64
गई हम सब नटवर ते हारि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaīṁ hama saba naṭavara te hāri
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गई हम सब नटवर ते हारि।
2सुनु मैया! यह तेरो छैया, बहुत सताई नारि।
3माखन चोरि फोरि घट पनघट, लंपट सोँ दे गारि।
4हँसि हँसि कहत"रसीली"मो कहँ, घूँघट के पट टारि।
5सब घर करत लँगरई नित प्रति, नहिं घर इक दुइ चारि।
6अति की अति “कृपालु” अति खोटी, मन महँ लेहु विचारि॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि उलाहना देती हुई कहती है कि इस तेरे कन्हैया से हम सब हार गयीं। मैया! तेरे इस कन्हैया ने हम सब ब्रज बनिताओं को असह्य दुःख दिया है, कान खोल कर सुन ले। यह मक्खन की चोरी करता है एवं पनघट पर घड़ा फोड़कर लफंगों की तरह गाली देता है और घूँघट के पट हटा कर हँस-हँस कर मुझसे 'रसीली'कहता है। इस प्रकार का ऊधम दो चार घरों में ही नहीं वरन् सभी घरों में नित्य प्रति किया करता है। 'कृपालु' के शब्दों में अति की अति अत्यन्त बुरी होती है। अतएव मैया!! मन में गंभीर विचार कर ले।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 325