# गई हम सब नटवर ते हारि।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0332-M07-K064
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 64
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 155–155

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गई हम सब नटवर ते हारि।  
<a id="line-2"></a>सुनु मैया! यह तेरो छैया, बहुत सताई नारि।  
<a id="line-3"></a>माखन चोरि फोरि घट पनघट, लंपट सोँ दे गारि।  
<a id="line-4"></a>हँसि हँसि कहत"रसीली"मो कहँ, घूँघट के पट टारि।  
<a id="line-5"></a>सब घर करत लँगरई नित प्रति, नहिं घर इक दुइ चारि।  
<a id="line-6"></a>अति की अति “कृपालु” अति खोटी, मन महँ लेहु विचारि॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखि उलाहना देती हुई कहती है कि इस तेरे कन्हैया से हम सब हार गयीं। मैया! तेरे इस कन्हैया ने हम सब ब्रज बनिताओं को असह्य दुःख दिया है, कान खोल कर सुन ले। यह मक्खन की चोरी करता है एवं पनघट पर घड़ा फोड़कर लफंगों की तरह गाली देता है और घूँघट के पट हटा कर हँस-हँस कर मुझसे 'रसीली'कहता है। इस प्रकार का ऊधम दो चार घरों में ही नहीं वरन् सभी घरों में नित्य प्रति किया करता है। 'कृपालु' के शब्दों में अति की अति अत्यन्त बुरी होती है। अतएव मैया!! मन में गंभीर विचार कर ले।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 325

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
