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श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 65

ग्वाल सँग गो चारत गोपाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gwāla saṁga, go chārata gopāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ग्वाल सँग गो चारत गोपाल।

2कोउ गावत कोउ वेनु बजावत, कोउ नाचत दै ताल।

3खेलत खेल हरावत हारत, रीझत खीझत ग्वाल।

4षटरस व्यंजन करत वियालू, राजत बिच नँदलाल।

5भोग लगाय खाउ सब, इमि कहि, चली मनसुखा चाल।

6हरि दृग मूँदत खाइ गये सब, उन कर अशन रसाल।

7हँसनि सखनि सुनि, अशन न निज लखि, भज्यो रुदत ततकाल।

8इमि “कृपालु” तेहि ग्वाल रुवावत, अमित काल जेहि गाल॥

हिन्दी भावार्थ

( श्रीकृष्ण यमुना के किनारे गाय चराते हुए, सखाओं के साथ खेल कर रहे हैं।) गोपाल ग्वालों के साथ गायों को चरा रहे हैं। कोई गाना गाता है, कोई बाँसुरी बजाता है, कोई हाथों से ताल दे-देकर नाचता है। परस्पर विविध प्रकार के खेल खेलते हैं एवं एक-दूसरे को हराते हैं, कभी हारते भी हैं, कभी प्रसन्न होते हैं, कभी खीझ जाते हैं। इस प्रकार जीत व हार के अनुसार सभी ग्वाल सुख दुःख का अनुभव करते हैं। खेलने के पश्चात् मधुर, खट्टे नमकीन, कड्वे, तीखे, कसैले इन छः प्रकार के रसों से बने हुए विविध प्रकार के व्यंजन, जो अपने घर से लाये थे, एक मण्डल बनाकर तथा मण्डल के बीच में श्रीकृष्ण को बिठाकर खाने लगे। इतने में ही मनसुखा ने एक चाल चली। मनसुखा कहता है कि देखो भाई! आज तो सब लोग भगवान् का भोग लगाकर तत्पश्चात् कलेऊ करो। सबने यह बात मान ली, एवं सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण ने ही भगवान् को भोग लगाने के लिए अपने नेत्र बन्द किए। इतने में ही मनसुखा की राय से सभी सखा लोग चुपके से हँसने लगे, तब श्रीकृष्ण का कलेऊ आगे से उठाकर चट कर गये। इसके बाद सखा लोग हँसने लगे, तब श्रीकृष्ण के नेत्र खुले। श्रीकृष्ण ने यह सब चाल सखाओं की समझकर रोना प्रारम्भ कर दिया एवं रोते हुए ही मैया के पास चल दिये। 'कृपालु' कहते हैं कि जिनके मुख में पन है सको काल निवास करते हैं आज उसी को गोकुल के ग्वाल हला रहे हैं। धन्य है उस सख्य-प्रेम को!

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 325-326