श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 63
क्यों रहिहैँ ब्रज ब्रजनार रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kyoṁ rahihaiṁ braja brajanāra re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1क्यों रहिहैँ ब्रज ब्रजनार रे।
2करत लँगरई दिन प्रति दूनी, नटखट नंदकुमार रे।
3घूँघट के पट टारि कहत टुक, हमरिहुँ ओर निहार रे।
4जो बरजहु तो कर बरजोरी, चुनरिहुँ शीश उतार रे।
5लै लकुटिहिं मटुकीहूँ फोरत, तोरत गर लर हार रे।
6सब “कृपालु” ब्रज नारि हारि गई, कछु न याय उपचार रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि कहती है कि अब इस ब्रज में ब्रजांगनाओं का रहना असम्भव है, क्योंकि यहाँ पर नटखट श्यामसुन्दर का ऊधम दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। वे गोपियों के धूँघट को खोलकर उनसे कहते हैं कि तनिक हमारी ओर भी तो देखो। अगर उन्हें घूँघट खोलने से कोई रोकती है तो बरबस सिर से चुनरी भी उतार देते हैं। साथ ही हाथ में लठिया लेकर पीछे से मटुकी फोड़ देते हैं। जब वह मुड़कर देखने लगती है तो उसके गले के हार भी तोड़ देते हैं। 'कृपालु' के कथनानुसार समस्त ब्रजांगनाएँ सब प्रकार से हार चुकी हैं। अब कोई भी उपाय शेष नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 324