श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 62
को कर, कारे ते यारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ko kara, kāre te yārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1को कर, कारे ते यारी।
2कहत मनसुखा, सुनहु कान्ह तुम, मन के कपटी भारी।
3जनमत जननि जनक तजि भाज्यो, बंदी गृह छल धारी।
4बन्यो धूत-मति पूत यशोमति, निज माया विस्तारी।
5नव लख धेनु बबा घर तबहूँ, करत रहत बटमारी।
6काहुहिं भरत चहुँटिया काहुहिं, चुटिया बाँधत डारी।
7आपन काम बनाय चातुरिहिं, औरन काम बिगारी।
8कहत “कृपालु” यार! कारे की, सब करतूतिहुँ कारी॥
हिन्दी भावार्थ
मनसुखा छोटे से ठाकुरजी को चिढ़ाते हुए कहता है ''काले कन्हैया से कौन मित्रता करे। अरे कन्हैया तू तो मन का भी महान् कपटी है। सुना है तूने पैदा होते ही वसुदेव देवकी को जेल में छोड़कर नन्द-यशोदा को अपना पिता माता बना लिया था। तेरे छल-कपट का यह सर्वप्रथम और सबसे बड़ा ज्वलन्त उदाहरण है। नन्दबाबा के घर में नौ लाख गाय हैं फिर भी दूध-दही के लिए ब्रजांगनाओं के घर-घर डकैती करता रहता है। किसी को चुटकी काट लेता है एवं किसी की चोटी पेड़ की डाल में बाँध देता है। छल-कपट के द्वारा दूसरों का काम बिगाड़ कर अपने काम बजाने में ही संलग्न रहता है।''इतने में 'कृपालु' ने कहा अरे मनसुख! तू ठीक कहता है। अरे यार! इसका शरीर हीं काला नहीं है वरन् इसकी सारी करतूतें भी काली हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 323-324