# को कर, कारे ते यारी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0330-M07-K062
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 62
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 154–154

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>को कर, कारे ते यारी।  
<a id="line-2"></a>कहत मनसुखा, सुनहु कान्ह तुम, मन के कपटी भारी।  
<a id="line-3"></a>जनमत जननि जनक तजि भाज्यो, बंदी गृह छल धारी।  
<a id="line-4"></a>बन्यो धूत-मति पूत यशोमति, निज माया विस्तारी।  
<a id="line-5"></a>नव लख धेनु बबा घर तबहूँ, करत रहत बटमारी।  
<a id="line-6"></a>काहुहिं भरत चहुँटिया काहुहिं, चुटिया बाँधत डारी।  
<a id="line-7"></a>आपन काम बनाय चातुरिहिं, औरन काम बिगारी।  
<a id="line-8"></a>कहत “कृपालु” यार! कारे की, सब करतूतिहुँ कारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मनसुखा छोटे से ठाकुरजी को चिढ़ाते हुए कहता है ''काले कन्हैया से कौन मित्रता करे। अरे कन्हैया तू तो मन का भी महान् कपटी है। सुना है तूने पैदा होते ही वसुदेव देवकी को जेल में छोड़कर नन्द-यशोदा को अपना पिता माता बना लिया था। तेरे छल-कपट का यह सर्वप्रथम और सबसे बड़ा ज्वलन्त उदाहरण है। नन्दबाबा के घर में नौ लाख गाय हैं फिर भी दूध-दही के लिए ब्रजांगनाओं के घर-घर डकैती करता रहता है। किसी को चुटकी काट लेता है एवं किसी की चोटी पेड़ की डाल में बाँध देता है। छल-कपट के द्वारा दूसरों का काम बिगाड़ कर अपने काम बजाने में ही संलग्न रहता है।''इतने में 'कृपालु' ने कहा अरे मनसुख! तू ठीक कहता है। अरे यार! इसका शरीर हीं काला नहीं है वरन् इसकी सारी करतूतें भी काली हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 323-324

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
