श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 61
कान्ह! हम सुने तुमहिं भगवान!
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha! hama sune tumahiṁ bhagawāna!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह! हम सुने तुमहिं भगवान!
2साँचु बताउ मोहिं मनमोहन, कहहुँ न काहुहिं आन।
3मोहिं परतीति होति नहिं नेकहुँ, हौं तुम कहँ भल जान।
4षडैश्वर्य परिपूर्ण सुन्यों हौं, है याकी पहिचान।
5तुम्हरे तो एकहुँ नहिं दीखत, पुनि हम लें कत मान।
6मोहिं समुझाउ सौंह तोहिं मोरी, सुनहु सखी! कह कान्ह।
7होत विभोर “कृपालु” प्रेम लखि, रहत न शक्ति हिं भान॥
हिन्दी भावार्थ
एक भोली-भाली सखि कहती है कि हे श्यामसुन्दर! मने सुना है कि तुम्हीं भगवान् हो। हे मनमोहन! मुझसे सच्ची सच्ची बात बता दो, मैं और किसी से नहीं बताऊँगी। मुझे तो थोड़ा भी विश्वास नहीं होता, क्योंकि मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से भली-भाँति परिचित हूँ। मैंने सुना है कि भगवान् छहों ऐश्वर्यों से परिपूर्ण होता है (समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य)। तुम्हारे भीतर तो इन ऐश्वर्यों में एक भी नहीं दिखाई पड़ता। फिर हमें विश्वास कैसे हो? यदि तुम सचमुच भगवान् हो तो मेरी सौगन्ध है मुझे समझा दो। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर ने कहा कि मेरे भीतर छहों ऐश्वर्यों की शक्तियाँ हैं किन्तु भक्तों के प्रेम में मैं इतना विभोर हो जाता हूँ कि मुझे उन शक्तियों का बिल्कुल भान ही नहीं रहता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 322-323