# कान्ह! हम सुने तुमहिं भगवान!

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0329-M07-K061
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 61
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 153–154

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह! हम सुने तुमहिं भगवान!  
<a id="line-2"></a>साँचु बताउ मोहिं मनमोहन, कहहुँ न काहुहिं आन।  
<a id="line-3"></a>मोहिं परतीति होति नहिं नेकहुँ, हौं तुम कहँ भल जान।  
<a id="line-4"></a>षडैश्वर्य परिपूर्ण सुन्यों हौं, है याकी पहिचान।  
<a id="line-5"></a>तुम्हरे तो एकहुँ नहिं दीखत, पुनि हम लें कत मान।  
<a id="line-6"></a>मोहिं समुझाउ सौंह तोहिं मोरी, सुनहु सखी! कह कान्ह।  
<a id="line-7"></a>होत विभोर “कृपालु” प्रेम लखि, रहत न शक्ति हिं भान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक भोली-भाली सखि कहती है कि हे श्यामसुन्दर! मने सुना है कि तुम्हीं भगवान् हो। हे मनमोहन! मुझसे सच्ची सच्ची बात बता दो, मैं और किसी से नहीं बताऊँगी। मुझे तो थोड़ा भी विश्वास नहीं होता, क्योंकि मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से भली-भाँति परिचित हूँ। मैंने सुना है कि भगवान् छहों ऐश्वर्यों से परिपूर्ण होता है (समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य)। तुम्हारे भीतर तो इन ऐश्वर्यों में एक भी नहीं दिखाई पड़ता। फिर हमें विश्वास कैसे हो? यदि तुम सचमुच भगवान् हो तो मेरी सौगन्ध है मुझे समझा दो। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर ने कहा कि मेरे भीतर छहों ऐश्वर्यों की शक्तियाँ हैं किन्तु भक्तों के प्रेम में मैं इतना विभोर हो जाता हूँ कि मुझे उन शक्तियों का बिल्कुल भान ही नहीं रहता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 322-323

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
