श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 60
कान्ह सों कहति कहानी माय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha soṁ kahati kahānī māya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह सों कहति कहानी माय।
2नींद न आवति आजु कान्ह कहँ, चाहत माय सुवाय।
3कह्यो माय सुनु अवधपुरी महँ, इक रहे दशरथ राय।
4तिनके चारि पुत्र रह तिन महँ, राम रहे बड़भाय।
5उनके रही नारि वैदेही, दोउ अवतार कहाय।
6चौदह बरस काँहि कछु कारन, उन वनवासहिं पाय।
7वन महँ रावण हर्यो जानकिहिं, लै गयो गगन उड़ाय।
8यह सुनि कहत चल्यो"हा सीते!, हा वैदेही हाय"।
9यह लखि सभय माय कर पकर्यो, मुरछित भये बलभाय।
10माय “कृपालु” लगाय कंठ कह, करु भगवान सहाय॥
हिन्दी भावार्थ
(छोटे से ठाकुर जी को सुलाने का मैया का प्रयत्न) मैया कन्हैया से कहानी कह रही है। आज कन्हैया को नींद नहीं आ रही है और मैया सुलाने का प्रयत्न कर रही है। मैया ने कहा-''कन्हैया। एक कहानी सुन। अयोध्या में एक दशरथ नाम के राजा थे; उनके राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चार पुत्र थे। उनमें राम सबसे बड़े भाई थे। उन राम के सीता नाम की स्त्री थी और उन दोनों को ही महात्मा लोग भगवान् का अवतार मानते थे। उन राम जी को किसी कारण से चौदह वर्ष का वनवास हो गया। बन में राक्षस रावण ने सीता का हरण कर लिया और वह उन्हें आकाश मार्ग से उड़ा कर लंका ले गया'। इतना सुनते ही श्यामसुन्दर "हा सीते! हा वैदेही!'कह कर अत्यन्त विहृल होकर रोते हुए पलंग से उठकर चल दिये। यह विलक्षण अवस्था देखकर मैया डर गयीं और दौड़ कर श्यामसुन्दर को पकड़ लिया। श्यामसुन्दर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। 'कृपालु' के शब्दों में मैया ने श्यामसुन्दर को गले लगाकर कहा-'"हाय राम! मेरे लाल को क्या हो गया? हे भगवान्! मेरे लाला की रक्षा करो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 321-322