श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 59
कान्ह यह कौन तिहारी बान?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha yaha, kauna tihārī bāna?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह यह कौन तिहारी बान?।
2यशुमति कह सुनि लेहु कान्ह अब, खोलि आपुनो कान।
3ज्यों ज्यों तोहिं जगावति त्यों त्यों, सोवत कामरि तान।
4अब लौं तोहिं न कबहुँ जगैहौं, सोउ साँझ लौं कान्ह।
5अपनो लाल बनैहौं दाउहिं, तुमहिं नाहिं जिय जान।
6जानि “कृपालु” रिसानि मातु हरि, धाय अंक लिपटान॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर को जगाते-जगाते खीझकर मैया कहती है ''कन्हैया, यह तुम्हारी आदत अच्छी नहीं है। तुम अपने दोनों कान खोलकर सुन लो, अब मै तुम्हें कभी नहीं जगाऊँगी शाम तक पेट भरकर सो लो। मैं तुम्हें जितना ही जगाती हूँ तुम उतनी ही कामरी तान कर सो जाते हो! अब मैं जा रही हूँ। बलदाऊ को अपना लाला बना लूँगी, तुमको नहीं बनाऊँगी। कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर मैया को रूठी हुई जानकर तुरन्त उठकर, दौड़कर मैया की गोद में इस आशय से लिपट गये कि कहीं मैया भैया को लाल न बना ले।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 320-321