श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 58
कान्ह तुम माँगत कैसो दान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha tuma, māṁgata kaiso dāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह तुम माँगत कैसो दान।
2माँगत दान दीन बनि भिक्षुक, तुम्हरे उर अभिमान।
3जो कहु"हौं नहिं भिक्षुक, माँगत, दान सहित सम्मान"।
4तो सुनु ऐसो दान द्विजन कहँ, तुम यादव जग जान।
5ग्रहन-शमन हित दान माँग जो, ज्योतिर्विद उनमान।
6मम “कृपालु” अनुकूल सबै ग्रह, जाहु गाम कहुँ आन॥
हिन्दी भावार्थ
दधि-दान माँगने वाले नटखट श्यामसुन्दर से एक सखि कहती है-हे कृष्ण! तुम किस प्रकार का दान चाहते हो? एक दान.तो भिखारियों का होता है जिसमें भिखारी दीनतापूर्वक माँगता है, तुम्हारे समान अभिमानयुक्त होकर नहीं माँगता। यदि यह कहो कि मैं भिखारियों के समान दीन बनकर दान नहीं माँगता वरन् सम्मानपूर्वक ही दान चाहता हूँ, तो सुनो, ऐसा दान तो एकमात्र ब्राह्मणों को ही दिया जाता है, जब कि तुम नम्बरी अहीर हो। यदि यह कहो कि ज्योतिषी लोग भी तो ग्रहों की शान्ति के लिये सम्मानपूर्वक दान लेते हैं तो ज्योतिषी जी महाराज! कृपालु' के शब्दों में हमारे समस्त ग्रह हमारे अनुकूल ही हैं आठवें या बारहवें नहीं हैं; अतएव अपना पोधी-पत्रा लेकर किसी और गाँव में पधारो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 319-320