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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 57

कान्ह को पकर्यो हलधर कान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha ko pakaryo haladhara kāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कान्ह को पकर्यो हलधर कान।

2हौं तो कहँ कब ते रह टेरत, तू इत टेरत तान।

3चलिय घेरि लै आइय गैयन, अहैं रिसान सखान।

4हरि दृग-अँसुवन-माल पिरोवत, चले मनहिं डरपान।

5सखन कह्यो"क्यों रे कनुआँ कहँ, अब लौं रह्यो लुकान।

6जितनोइ छोट खोट तू तितनोइ, झूठेहिं रोदन ठान"।

7कह “कृपालु” यह छलिन शिरोमणि, मायापति भगवान॥

हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण सखाओं से छुपकर कहीं दूर जाकर वंशी बजा रहे थे। सखाओं ने कई बार पुकारा एवं बलराम को ढूँढने के लिए भेजा। जब बलराम को श्रीकृष्ण मिले तब का यह वृतान्त है।) बलराम जी ने श्रीकृष्ण का कान पकड़ लिया और कहा, 'क्यों रे! मैं तुझे कब से टेर रहा हूँ, और तू इधर छिपकर मुरली की तान टेर रहा है। चल, शीघ्र ही गायों को हाँककर ले आ, सखागण अत्यन्त क्रुद्ध हैं।'श्रीकृष्ण का कान बलराम पकड़े हुए हैं और श्रीकृष्ण आंखों से आँसू हाते हुए बलराम के साथ चले जा रहे हैं। साथ ही मन में डर भी रहे हैं कि पता नहीं सखाओं के द्वारा क्या नौबत गुजरे। सखाओं ने दूर से ही श्रीकृष्ण को आता देखकर कहा, 'क्यों रे कनुआ! तू अभी तक कहाँ छिपा हुआ था? तू जितना ही छोटा है उतना ही अधिक खोटा भी है, और झूठ-मूठ ही रो रहा है ताकि सखा लोग क्षमा कर दें।'इसी अवसर पर 'कृपालु' ने भी सखाओं से कहा कि अरे मित्रों! क्या तुम लोग नहीं जानते कि यह कपट करने वालों में सिरमौर, स्वयं माया का स्वामी भगवान् नंदलाल के रूप में अवतरित हुआ है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 318-319