# कान्ह को पकर्यो हलधर कान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0325-M07-K057
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 57
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 151–152

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह को पकर्यो हलधर कान।  
<a id="line-2"></a>हौं तो कहँ कब ते रह टेरत, तू इत टेरत तान।  
<a id="line-3"></a>चलिय घेरि लै आइय गैयन, अहैं रिसान सखान।  
<a id="line-4"></a>हरि दृग-अँसुवन-माल पिरोवत, चले मनहिं डरपान।  
<a id="line-5"></a>सखन कह्यो"क्यों रे कनुआँ कहँ, अब लौं रह्यो लुकान।  
<a id="line-6"></a>जितनोइ छोट खोट तू तितनोइ, झूठेहिं रोदन ठान"।  
<a id="line-7"></a>कह “कृपालु” यह छलिन शिरोमणि, मायापति भगवान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण सखाओं से छुपकर कहीं दूर जाकर वंशी बजा रहे थे। सखाओं ने कई बार पुकारा एवं बलराम को ढूँढने के लिए भेजा। जब बलराम को श्रीकृष्ण मिले तब का यह वृतान्त है।) बलराम जी ने श्रीकृष्ण का कान पकड़ लिया और कहा, 'क्यों रे! मैं तुझे कब से टेर रहा हूँ, और तू इधर छिपकर मुरली की तान टेर रहा है। चल, शीघ्र ही गायों को हाँककर ले आ, सखागण अत्यन्त क्रुद्ध हैं।'श्रीकृष्ण का कान बलराम पकड़े हुए हैं और श्रीकृष्ण आंखों से आँसू हाते हुए बलराम के साथ चले जा रहे हैं। साथ ही मन में डर भी रहे हैं कि पता नहीं सखाओं के द्वारा क्या नौबत गुजरे। सखाओं ने दूर से ही श्रीकृष्ण को आता देखकर कहा, 'क्यों रे कनुआ! तू अभी तक कहाँ छिपा हुआ था? तू जितना ही छोटा है उतना ही अधिक खोटा भी है, और झूठ-मूठ ही रो रहा है ताकि सखा लोग क्षमा कर दें।'इसी अवसर पर 'कृपालु' ने भी सखाओं से कहा कि अरे मित्रों! क्या तुम लोग नहीं जानते कि यह कपट करने वालों में सिरमौर, स्वयं माया का स्वामी भगवान् नंदलाल के रूप में अवतरित हुआ है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 318-319

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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