श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 56
कान्ह के गुन नूतन सुन माय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha ke guna nūtana suna māya!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह के गुन नूतन सुन माय।
2हौं यमुना-तट गई भरन घट, साँकरि द्वार चढ़ाय।
3साँकरि खोलि लँगर घर भीतर, धँस्यो सखन सँग जाय।
4पुनि बैठारि द्वार मनसुख कहँ, साँकरि दइ लगवाय।
5हौं जब गई कह्यो मनसुख तब, यशुमति तोहिं बुलाय।
6गागरि धरन गई घर सोचत, काहे मनसुख आय।
7तहँ देखी यह कान्ह सखन सँग, नवनि दुहुँन कर खाय।
8मोहिं लखि सब भागे पाछे ते, झपटि पीत पट पाय।
9हरि कह इक तो मैया मेरो, लिय पट पीत चुराय।
10ऊपर ते “कृपालु” मोहिं ग्वालिनि, उलटो चोर बताय॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी उलाहना देते हुए मैया से कहती है कि मैया अपने कन्हैया के नये-नये गुण सुन ले। कल मैं अपने घर के दरवाजे की साँकल को चढ़ाकर यमुना के किनारे पानी भरने गयी। इतने में ही यह नटखट अपने सखाओं को लेकर साँकल को खोलकर घर के भीतर घुस गया। मनसुखा को घर के बाहर बिठा कर बाहर से साँकल लगवा दी। जब मैं घड़ा भर कर गयी तब मनसुखा ने कहा कि तुझे यशोदा मैया ने बुलाया है। मैं घड़ा रखने घर गयी एवं यह सोचने लगी कि मनसुखा क्यों आया है? मैया ने क्यों बुलाया है? जरूर कुछ दाल में काला है। घर में घुसते ही मैंने देखा कि यह तुम्हारे लाड़ले सखाओं के साथ दोनों हाथों से जल्दी-जल्दी मक्खन खा रहे हैं। मेरे घड़ा रखते-रखते मुझे देखकर सब भाग गये पीछे से झपटने पर यह पीताम्बर हाथ लगा। श्यामसुन्दर ने बात बनाते हुए कहा कि मैया! एक तो इस सखी ने मेरा पीताम्बर चुरा लिया, फिर ऊपर से 'कृपालु' के शब्दों में मुझे ही चोर बता रही है। लोग ठीक ही कहते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 317-318