श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 55
कान्ह की सुन करतूतहिं मात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha kī suna karatūtahiṁ māta!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह की सुन करतूतहिं मात।
2कालिंदी के पुलिन कालि हौं, रही अलिन सँग न्हात।
3निलज निपट झटपट मम पट लै, दुर्यो कुंज बलभ्रात।
4पुनि प्रकट्यो सब वस्त्र धारि मम, मंद मंद मुसकात।
5आपुन पट यमुना-तट धरि कह,"पहिरि लेहु निज गात"।
6विनती सुनी न एक चल्यो कहि,"राम, राम, अब जात"।
7लौटि कह्यो पुनि"तब पट दैहौं, जब जोरहु पति-नात"।
8भयो “कृपालु” कहा पुनि अब नहिं, कहौं लाज की बात॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी मैया से उलाहना देती हुई कहती है कि अपने कन्हैया की काली करतूत सुन ले। मैं कल यमुना में सखियों के साथ स्नान कर रही थी कि इतने ही में वह निर्लज्ज ऊधमी, झट मेरा वस्त्र लेकर कुंज में छिप गया कुछ देर बाद मेरे सभी वस्त्रों को पहिन कर मंद-मंद मुस्कराता हुआ बाहर आया तथा अपने उतरे हुए समस्त वस्त्रों को यमुना के तट पर रख कर कहने लगा, इन वस्त्रों को तुम पहन लो। मैंने अनेक प्रकार से प्रार्थना की, किन्तु इसने एक भी न सुनी और कहने लगा 'राम, राम, सखी! अब मैं जा रहा हूँ।'जैसे तैसे फिर लौट कर कहने लगा कि मैं तुम्हारे वस्त्र तभी दूँगा जब तुम मुझे पति मानने का वादा करो। इतने में ही 'कृपालु' ने उस सखी से पूछा कि फिर आगे क्या हुआ? सखी ने कहा कि वह नहीं बताऊँगी क्योंकि वह लज्जा की बात है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 316-317