श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 54
करेगो को कारे ते ब्याहु।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karego ko kāre te byāhu
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करेगो को कारे ते ब्याहु।
2टुक मुख दर्पन देखु कन्हैया, पाछे दुलहिनि चाहु।
3बनि बटमार ठगत नित वनितनि, बनत साहु को साहु।
4निज अवगुन-गोपन हित झूठेहिं, सौ सौ सौगँध खाहु।
5सिगरे ब्रज के सखन सखिन ते, रार करत न अघाहु।
6कह “कृपालु” कहुँ कारी कुबरी, मिलिहहि जनि पछिताहु॥
हिन्दी भावार्थ
छोटे से ठाकुरजी को चिढ़ाने के लिये सखियाँ कहती हैं-'अरे कन्हैया! तुम बार-बार मैया से ब्याह करने को कहते हो किन्तु तुम सरीखे काले से कौन ब्याह करेगा? जरा शीशे में मुँह देख लो फिर दुलहिन माँगो। मार्ग में डकैतों की भाँति ब्रजांगनाओं के साथ ठगोरी करते हो और फिर बहुत ही भोले-भाले बन कर अपने अवगुणों को छिपाने के लिए झूठमूठ ही सैकड़ों सौगन्ध खाते हो। समस्त ब्रज के समस्त सखाओं एवं सखियों से झगड़ा करते रहते हो, भला ऐसी करतूतों पर तुम से कौन ब्याह करेगा?'''कृपालु' कहते हैं-'अरे कन्हैया! तुम निराश न हो। संसार में कोई-न-कोई काली कुबड़ी मिल ही जायेगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 316