# कान्ह की सुन करतूतहिं मात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0323-M07-K055
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 55
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 150–150

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह की सुन करतूतहिं मात।  
<a id="line-2"></a>कालिंदी के पुलिन कालि हौं, रही अलिन सँग न्हात।  
<a id="line-3"></a>निलज निपट झटपट मम पट लै, दुर्यो कुंज बलभ्रात।  
<a id="line-4"></a>पुनि प्रकट्यो सब वस्त्र धारि मम, मंद मंद मुसकात।  
<a id="line-5"></a>आपुन पट यमुना-तट धरि कह,"पहिरि लेहु निज गात"।  
<a id="line-6"></a>विनती सुनी न एक चल्यो कहि,"राम, राम, अब जात"।  
<a id="line-7"></a>लौटि कह्यो पुनि"तब पट दैहौं, जब जोरहु पति-नात"।  
<a id="line-8"></a>भयो “कृपालु” कहा पुनि अब नहिं, कहौं लाज की बात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी मैया से उलाहना देती हुई कहती है कि अपने कन्हैया की काली करतूत सुन ले। मैं कल यमुना में सखियों के साथ स्नान कर रही थी कि इतने ही में वह निर्लज्ज ऊधमी, झट मेरा वस्त्र लेकर कुंज में छिप गया कुछ देर बाद मेरे सभी वस्त्रों को पहिन कर मंद-मंद मुस्कराता हुआ बाहर आया तथा अपने उतरे हुए समस्त वस्त्रों को यमुना के तट पर रख कर कहने लगा, इन वस्त्रों को तुम पहन लो। मैंने अनेक प्रकार से प्रार्थना की, किन्तु इसने एक भी न सुनी और कहने लगा 'राम, राम, सखी! अब मैं जा रहा हूँ।'जैसे तैसे फिर लौट कर कहने लगा कि मैं तुम्हारे वस्त्र तभी दूँगा जब तुम मुझे पति मानने का वादा करो। इतने में ही 'कृपालु' ने उस सखी से पूछा कि फिर आगे क्या हुआ? सखी ने कहा कि वह नहीं बताऊँगी क्योंकि वह लज्जा की बात है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 316-317

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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