# कान्ह के गुन नूतन सुन माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0324-M07-K056
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 56
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 151–151

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह के गुन नूतन सुन माय।  
<a id="line-2"></a>हौं यमुना-तट गई भरन घट, साँकरि द्वार चढ़ाय।  
<a id="line-3"></a>साँकरि खोलि लँगर घर भीतर, धँस्यो सखन सँग जाय।  
<a id="line-4"></a>पुनि बैठारि द्वार मनसुख कहँ, साँकरि दइ लगवाय।  
<a id="line-5"></a>हौं जब गई कह्यो मनसुख तब, यशुमति तोहिं बुलाय।  
<a id="line-6"></a>गागरि धरन गई घर सोचत, काहे मनसुख आय।  
<a id="line-7"></a>तहँ देखी यह कान्ह सखन सँग, नवनि दुहुँन कर खाय।  
<a id="line-8"></a>मोहिं लखि सब भागे पाछे ते, झपटि पीत पट पाय।  
<a id="line-9"></a>हरि कह इक तो मैया मेरो, लिय पट पीत चुराय।  
<a id="line-10"></a>ऊपर ते “कृपालु” मोहिं ग्वालिनि, उलटो चोर बताय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी उलाहना देते हुए मैया से कहती है कि मैया अपने कन्हैया के नये-नये गुण सुन ले। कल मैं अपने घर के दरवाजे की साँकल को चढ़ाकर यमुना के किनारे पानी भरने गयी। इतने में ही यह नटखट अपने सखाओं को लेकर साँकल को खोलकर घर के भीतर घुस गया। मनसुखा को घर के बाहर बिठा कर बाहर से साँकल लगवा दी। जब मैं घड़ा भर कर गयी तब मनसुखा ने कहा कि तुझे यशोदा मैया ने बुलाया है। मैं घड़ा रखने घर गयी एवं यह सोचने लगी कि मनसुखा क्यों आया है? मैया ने क्यों बुलाया है? जरूर कुछ दाल में काला है। घर में घुसते ही मैंने देखा कि यह तुम्हारे लाड़ले सखाओं के साथ दोनों हाथों से जल्दी-जल्दी मक्खन खा रहे हैं। मेरे घड़ा रखते-रखते मुझे देखकर सब भाग गये पीछे से झपटने पर यह पीताम्बर हाथ लगा। श्यामसुन्दर ने बात बनाते हुए कहा कि मैया! एक तो इस सखी ने मेरा पीताम्बर चुरा लिया, फिर ऊपर से 'कृपालु' के शब्दों में मुझे ही चोर बता रही है। लोग ठीक ही कहते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 317-318

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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