# कान्ह तुम माँगत कैसो दान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0326-M07-K058
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 58
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 152–152

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह तुम माँगत कैसो दान।  
<a id="line-2"></a>माँगत दान दीन बनि भिक्षुक, तुम्हरे उर अभिमान।  
<a id="line-3"></a>जो कहु"हौं नहिं भिक्षुक, माँगत, दान सहित सम्मान"।  
<a id="line-4"></a>तो सुनु ऐसो दान द्विजन कहँ, तुम यादव जग जान।  
<a id="line-5"></a>ग्रहन-शमन हित दान माँग जो, ज्योतिर्विद उनमान।  
<a id="line-6"></a>मम “कृपालु” अनुकूल सबै ग्रह, जाहु गाम कहुँ आन॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

दधि-दान माँगने वाले नटखट श्यामसुन्दर से एक सखि कहती है-हे कृष्ण! तुम किस प्रकार का दान चाहते हो? एक दान.तो भिखारियों का होता है जिसमें भिखारी दीनतापूर्वक माँगता है, तुम्हारे समान अभिमानयुक्त होकर नहीं माँगता। यदि यह कहो कि मैं भिखारियों के समान दीन बनकर दान नहीं माँगता वरन् सम्मानपूर्वक ही दान चाहता हूँ, तो सुनो, ऐसा दान तो एकमात्र ब्राह्मणों को ही दिया जाता है, जब कि तुम नम्बरी अहीर हो। यदि यह कहो कि ज्योतिषी लोग भी तो ग्रहों की शान्ति के लिये सम्मानपूर्वक दान लेते हैं तो ज्योतिषी जी महाराज! कृपालु' के शब्दों में हमारे समस्त ग्रह हमारे अनुकूल ही हैं आठवें या बारहवें नहीं हैं; अतएव अपना पोधी-पत्रा लेकर किसी और गाँव में पधारो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 319-320

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
