# कान्ह सों कहति कहानी माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0328-M07-K060
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 60
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 153–153

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह सों कहति कहानी माय।  
<a id="line-2"></a>नींद न आवति आजु कान्ह कहँ, चाहत माय सुवाय।  
<a id="line-3"></a>कह्यो माय सुनु अवधपुरी महँ, इक रहे दशरथ राय।  
<a id="line-4"></a>तिनके चारि पुत्र रह तिन महँ, राम रहे बड़भाय।  
<a id="line-5"></a>उनके रही नारि वैदेही, दोउ अवतार कहाय।  
<a id="line-6"></a>चौदह बरस काँहि कछु कारन, उन वनवासहिं पाय।  
<a id="line-7"></a>वन महँ रावण हर्यो जानकिहिं, लै गयो गगन उड़ाय।  
<a id="line-8"></a>यह सुनि कहत चल्यो"हा सीते!, हा वैदेही हाय"।  
<a id="line-9"></a>यह लखि सभय माय कर पकर्यो, मुरछित भये बलभाय।  
<a id="line-10"></a>माय “कृपालु” लगाय कंठ कह, करु भगवान सहाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(छोटे से ठाकुर जी को सुलाने का मैया का प्रयत्न) मैया कन्हैया से कहानी कह रही है। आज कन्हैया को नींद नहीं आ रही है और मैया सुलाने का प्रयत्न कर रही है। मैया ने कहा-''कन्हैया। एक कहानी सुन। अयोध्या में एक दशरथ नाम के राजा थे; उनके राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चार पुत्र थे। उनमें राम सबसे बड़े भाई थे। उन राम के सीता नाम की स्त्री थी और उन दोनों को ही महात्मा लोग भगवान् का अवतार मानते थे। उन राम जी को किसी कारण से चौदह वर्ष का वनवास हो गया। बन में राक्षस रावण ने सीता का हरण कर लिया और वह उन्हें आकाश मार्ग से उड़ा कर लंका ले गया'। इतना सुनते ही श्यामसुन्दर "हा सीते! हा वैदेही!'कह कर अत्यन्त विहृल होकर रोते हुए पलंग से उठकर चल दिये। यह विलक्षण अवस्था देखकर मैया डर गयीं और दौड़ कर श्यामसुन्दर को पकड़ लिया। श्यामसुन्दर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। 'कृपालु' के शब्दों में मैया ने श्यामसुन्दर को गले लगाकर कहा-'"हाय राम! मेरे लाल को क्या हो गया? हे भगवान्! मेरे लाला की रक्षा करो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 321-322

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
