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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 52

आजु हौं लरिहौं तो सन माय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju hauṁ larihauṁ to sana māya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1आजु हौं लरिहौं तो सन माय।

2जब जब हौं तो सन पूछत हौं, देति मंद मुसकाय।

3सबै खिझावत"कारो"कहि मोहिं, हँसि करताल बजाय।

4कोउ कहत"हम सुनी नंद जू, यमुना तट तोहिं पाय"।

5"याको बाप न माय त्रिकालहुँ", इमि कहि हँस बलभाय।

6सुनु लाला! तू मेरो जायो, दाउहिं बाबा जाय।

7कारो रंग “कृपालु” राम को, जो भगवान कहाय॥

हिन्दी भावार्थ

बालकृष्ण अपनी मैया से कहते हैं कि मैया! आज मैं डटकर तुझसे झगड़ा करूँगा। क्योंकि मैं जब जब तुझसे पूछता हूँ तू मंद-मंद मुस्कुरा देती है, बताती नहीं है। सभी लोग ताली बजा-बजाकर हँसते हुये मुझे 'कारो'ऐसा कह कर चिढ़ाते हैं। कोई कहता है कि हमने सुना है नंद जी ने यमुना के किनारे तुम्हें पड़ा हुआ पाया है। बलदाऊ भैया हँसकर यह कहते हैं कि इसके माता-पिता न कभी थे, न हैं न होंगे। मैया ने कहा कन्हैया वास्तविक बात तो यह है कि तुझको मैंने पैदा किया है एवं दाऊ भैया को तुम्हारे बाबा ने पैदा किया है। यह सुनकर ठाकुर जी को कुछ संतोष हो गया। इतने में ही 'कृपालु' ने व्यंगयोक्ति में श्यामसुन्दर से कहा कि काला रंग तो भगवान् राम का भी था फिर घबड़ाने की बात क्या है?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 313-314