श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 51
आजु हौं दैहौं विधि सों दान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju hauṁ daihauṁ vidhi soṁ dāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु हौं दैहौं विधि सों दान।
2हौं राधारानी जनि मो कहँ, जान ग्वालिनी आन।
3बैठि जाहु सम्मान-सहित हौं, ल्याऊँ पत्र लतान।
4लतन ओट बैठीं ललितादिक, गइँ संकेतहिं जान।
5धाइ पकरि दोउ कर सखि तरुवर, बाँध्यो श्याम सुजान।
6कह्यो लाड़ली ठगन-दान हित, इहै विधान बखान।
7कह “कृपालु” अब मुक्ति दान चह, देहु लली वृषभान॥
हिन्दी भावार्थ
दही के दान माँगने वाले श्यामसुन्दर से किशोरी जी कहती हैं कि हे श्यामसुन्दर! आज मैं तुमको विधिपूर्वक दान दूँगी। मैं महारानी राधिका हूँ, कोई अन्य गँवार ग्वालिनी नहीं हूँ, सम्मानपूर्वक तुम इसी स्थान पर बैठ जाओ, जब तक मैं लताओं के पत्ते ले आऊँ। उधर लताओं की ओट में बैठी हुई ललितादिक सखियाँ किशोरी जी के पूर्व निर्दिष्ट संकेत को पहिचान गयीं, अतएव सखियों ने दौड़कर श्यामसुन्दर के दोनों हाथों को पकड़कर उन्हें एक पेड़ से बाँध दिया। बँधे हुए श्यामसुन्दर से किशोरी जी ने कहा कि ठगों के प्रति दान का यही विधान बताया गया है। इतने में 'कृपालु' ने किशोरी जी से कहा कि हे किशोरी जी! तुमने दान देने का वचन दिया है अतएव बेचारे श्यामसुन्दर की वर्तमान इच्छानुसार मुक्ति-दान दे दीजिये अर्थात् उन्हें छोड़ दीजिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 312-313