# आजु हौं दैहौं विधि सों दान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0319-M07-K051
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 51
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 148–148

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>आजु हौं दैहौं विधि सों दान।  
<a id="line-2"></a>हौं राधारानी जनि मो कहँ, जान ग्वालिनी आन।  
<a id="line-3"></a>बैठि जाहु सम्मान-सहित हौं, ल्याऊँ पत्र लतान।  
<a id="line-4"></a>लतन ओट बैठीं ललितादिक, गइँ संकेतहिं जान।  
<a id="line-5"></a>धाइ पकरि दोउ कर सखि तरुवर, बाँध्यो श्याम सुजान।  
<a id="line-6"></a>कह्यो लाड़ली ठगन-दान हित, इहै विधान बखान।  
<a id="line-7"></a>कह “कृपालु” अब मुक्ति दान चह, देहु लली वृषभान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

दही के दान माँगने वाले श्यामसुन्दर से किशोरी जी कहती हैं कि हे श्यामसुन्दर! आज मैं तुमको विधिपूर्वक दान दूँगी। मैं महारानी राधिका हूँ, कोई अन्य गँवार ग्वालिनी नहीं हूँ, सम्मानपूर्वक तुम इसी स्थान पर बैठ जाओ, जब तक मैं लताओं के पत्ते ले आऊँ। उधर लताओं की ओट में बैठी हुई ललितादिक सखियाँ किशोरी जी के पूर्व निर्दिष्ट संकेत को पहिचान गयीं, अतएव सखियों ने दौड़कर श्यामसुन्दर के दोनों हाथों को पकड़कर उन्हें एक पेड़ से बाँध दिया। बँधे हुए श्यामसुन्दर से किशोरी जी ने कहा कि ठगों के प्रति दान का यही विधान बताया गया है। इतने में 'कृपालु' ने किशोरी जी से कहा कि हे किशोरी जी! तुमने दान देने का वचन दिया है अतएव बेचारे श्यामसुन्दर की वर्तमान इच्छानुसार मुक्ति-दान दे दीजिये अर्थात् उन्हें छोड़ दीजिये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 312-313

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
