श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 50
आजु हरि! हौं माँगति इक दान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju hari! hauṁ māṁgati ika dāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु हरि! हौं माँगति इक दान।
2सखी कह तब ते नींद न आवति, जब ते हौं गई जान।
3मांगति भीख क्षमा की तुम्हरो, कियो बहुत अपमान।
4हरि कह"सखि यह गूढ़ पहेली, हौं न सक्यों पहिचान"।
5सखि कह ऋषि दुर्वासा सों हौं, सुनी तुमहिं भगवान।
6हँसि “कृपालु” कह सखि! बाबन की, बात न करिये कान॥
हिन्दी भावार्थ
एक भोलौ-भाली सखी कहती है कि श्यामसुन्दर आज मैं तुमसे एक भीख माँगने आयी हूँ। जब से मैं यह जान गयी हूँ तब से मुझे रात भर नींद नहीं आती। मैंने तुम्हारा अत्यन्त अपमान किया है, अतएव क्षमा की भीख माँग रही हूँ। श्यामसुन्दर ने कहा अरी सखि! मैं तेरी इस गूढ़ पहेली को नहीं समझ पा रहा हूँ, स्पष्ट बता। सखी ने कहा कि महर्षि दुर्वासा से मैंने यह सुना है कि तुम ही भगवान् हो। 'कृपालु के शब्दों में हँसते हुए श्यामसुन्दर ने कहा, अरी सखि! अनुरागियों को वैरागी बाबा लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 311-312