श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 49
अरे ओ! निलज निपट बटमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are o! nilaja nipaṭa baṭamāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे ओ! निलज निपट बटमार।
2माखन चोरत मटुकिहुँ फोरत, तोरत मोतियन हार।
3लखत पराई नारि हाय दइ!, नटखट नंदकुमार।
4भोरिन गोरिन गोप किशोरिन, करत रहत दृग चार।
5बहुत लगावे मार कहौं जो, मम गूजर लठमार।
6पै “कृपालु” तू कहि न सकति सखि, मन चाहत रिझवार॥
हिन्दी भावार्थ
दधि-दान माँगने वाले श्यामसुन्दर को डाँटती हुई सखी कहती है कि अरे ओ घोर निर्लज्ज ठग! हम तुम्हें खूब जानती हैं। घर-घर में मक्खन की मटकी फोड़ते हो, ब्रजांगनाओं के गले का हार भी तोड़ते रहते हो। इतना ही नहीं, तुम्हें परलोक का भी डर नहीं है, क्योंकि दिन-रात पराई स्त्रियों पर कुदृष्टि रखते हो। परम सुन्दरी किशोरावस्था वाली गोप कन्याओ से आँखें लड़ाया करते हो। मैं विवाहिता स्त्री हूँ, मेरा पति बहुत बड़ा लठैत है, यदि मैं उससे कह दूँ तो वह तुम्हारी भली-भाँति मरम्मत कर दे! 'कृपालु'सखी के कान में चुपके से कहते हैं कि यह सब तो ठीक है, किन्तु तू अपने पति से कह ही नहीं सकती क्योंकि उस परम पुरुष श्यामसुन्दर से तेर परम प्रेम है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 311