श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 48
अरे ओ, मुरली वारे कान्ह!।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are o, muralī vāre kānha!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे ओ, मुरली वारे कान्ह!।
2मोते बढ़ि बढ़ि बात करत कत, मो कहँ जान न आन।
3द्वै बापन वारो अति कारो, को नहिं तो कहँ जान।
4जियत कंस ब्रजराज कहावत, माँगत दधि को दान।
5लट्ठ गँवारन ग्वारन सँग लै, छलत सबै सखियान।
6यह “कृपालु” कछु बात नई नहिं, मायापति पहिचान॥
हिन्दी भावार्थ
दधि का दान माँगने वाले श्यामसुन्दर से एक सखी कहती है कि अरे ओ मुरली वाले श्यामसुन्दर! मुझसे बढ़ बढ़ कर बात न करो। मुझे कोई ऐसी-वैसी मत समझना! नन्द, वसुदेव रूपी दो बाप वाले, रंग के काले! तुम्हें भला कौन नहीं जानता! आश्चर्य तो यह है कि कंस के जीवित रहते हुए भी तुम ब्रजराज कहलाते हो एवं दही का दान माँगते हो। अँगूठा छाप घोर गंवार ग्वालों को साथ लेकर भोरी भारी गोपियों को ठगते फिरते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! यह बात कोई नयी नहीं है। मायापति भगवान् के प्रत्येक अवतार में इसी प्रकार के ठगाई के कार्य हो चुके हैं। यही तो भगवान् की पहिचान है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 310