श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 47
अरी ओ, घूँघट वारी नारि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī o, ghūṁghaṭa vārī nāri!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी ओ, घूँघट वारी नारि।
2तन मन प्रान दान दे कान्हहिं, जीवन है दिन चारि।
3निलज निपट लंपट चलु हटु हटु, जनि दीजो मोहिं गारि।
4मम गूजर लठमार कहौं जो, ले ठकुराइ निकारि।
5हौं न कबहुँ पर-पुरुष निहार्यों, इक पतिव्रत व्रतधारि।
6यह “कृपालु” पर पुरुष नाहिं सखि, परम पुरुष अवतारि॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर एक सखी से कहते हैं, अरी ओ घुँघट वाली ग्वालिन! अपना तन, मन, प्राण श्यामसुन्दर को दे दे क्योंकि यह मनुष्य-जीवन चार दिन का ही है। सखी ने कहा अरे ओ निर्लज्ज, लम्पट, श्यामसुन्दर! सामने से हट जा! सामने से हट जा! मुझे गाली न दे। नहीं तो मैं अपने पति से कह दूँगी। मेरा पति प्रख्यात लठैत है। वह तुम्हारी सब ठकुराई निकाल देगा। मैंने आज तक परपुरुष को ओर आँख उठाकर नहीं देखा है। एक मात्र पतिव्रत धर्म का ही पालन किया है। कृपालु' कहते हैं अरी सखि! यह श्यामसुन्दर परपुरुष नहीं है। यह तो परम पुरुष हैं। अवतार लेकर तुम लोगों को कृतार्थ करने आये हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 309-310