श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 46
अरे ओ, छलिया नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are o, chhaliyā nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरे ओ, छलिया नंदकुमार।
2डगर छाँड़ु हटु लँगर झगर करि, दधि चाहत बटमार।
3हौं तो कहँ जानति सब दिन ते, कहिहौं पल्लाझार।
4नहिं पाये कहुँ ठौर और जब, जनमे कारागार।
5तहहुँ न रहि पाये जब धाये, गोकुल ग्राम मझार।
6तहहूँ ते धाये तब आये, नंदगाँव पगधार।
7अब नँद की नित गाय चरावत, सँग रह ग्वार गमार।
8ह्याँ “कृपालु” नहिं चल बरजोरी, हम सिंहिनि तुम स्यार॥
हिन्दी भावार्थ
दधि के दान माँगने वाले श्यामसुन्दर को डाँटती हुई दूर हट जा। तू डकैतों की तरह झगड़ा करके जबर्दस्ती दही खाना चाहता है। मैं तुझको अनादि काल से जानती हूँ। मैं तुझको त्रैलोक्य में जब किसी ने भी स्थान नहीं दिया तब तूने कंस की जेल में जन्म लिया। किन्तु वहाँ भी न रह पाया, रातों रात भाग कर गोकुल जाना पड़ा। फिर वहाँ से भी अपनी इन्हीं करतूतों के कारण निकल कर नन्दगाँव में वृषभानु राजा की कृपा से स्थान पाया। आजकल नन्द बाबा की गायों को चरा कर पेट पालते हो एवं संग में अपने ही समान कुछ उठल्लू सखाओं को रखते हो। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि यह सब तुम्हारी बरजोरी यहाँ नहीं चलेगी क्योंकि हम शेरनी के समान हैं और तुम सियार के समान हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 308-309