# अरे ओ, छलिया नंदकुमार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0314-M07-K046
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 46
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 146–146

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरे ओ, छलिया नंदकुमार।  
<a id="line-2"></a>डगर छाँड़ु हटु लँगर झगर करि, दधि चाहत बटमार।  
<a id="line-3"></a>हौं तो कहँ जानति सब दिन ते, कहिहौं पल्लाझार।  
<a id="line-4"></a>नहिं पाये कहुँ ठौर और जब, जनमे कारागार।  
<a id="line-5"></a>तहहुँ न रहि पाये जब धाये, गोकुल ग्राम मझार।  
<a id="line-6"></a>तहहूँ ते धाये तब आये, नंदगाँव पगधार।  
<a id="line-7"></a>अब नँद की नित गाय चरावत, सँग रह ग्वार गमार।  
<a id="line-8"></a>ह्याँ “कृपालु” नहिं चल बरजोरी, हम सिंहिनि तुम स्यार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

दधि के दान माँगने वाले श्यामसुन्दर को डाँटती हुई दूर हट जा। तू डकैतों की तरह झगड़ा करके जबर्दस्ती दही खाना चाहता है। मैं तुझको अनादि काल से जानती हूँ। मैं तुझको त्रैलोक्य में जब किसी ने भी स्थान नहीं दिया तब तूने कंस की जेल में जन्म लिया। किन्तु वहाँ भी न रह पाया, रातों रात भाग कर गोकुल जाना पड़ा। फिर वहाँ से भी अपनी इन्हीं करतूतों के कारण निकल कर नन्दगाँव में वृषभानु राजा की कृपा से स्थान पाया। आजकल नन्द बाबा की गायों को चरा कर पेट पालते हो एवं संग में अपने ही समान कुछ उठल्लू सखाओं को रखते हो। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि यह सब तुम्हारी बरजोरी यहाँ नहीं चलेगी क्योंकि हम शेरनी के समान हैं और तुम सियार के समान हो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 308-309

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
