श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 45
अरी ओ, दधि की बेचनिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī o, dadhi kī bechanihāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी ओ, दधि की बेचनिहार।
2हौं ब्रजराज न जानति मो कहँ, तू अति लट्ठगमार।
3दै दे दधि को दान ग्वालिनी, काहे बढ़ावति रार।
4"जयतु, जयतु ब्रजराज!"सखी कह, क्षमिय क्षमिय सरकार।
5महल त्यागि महराज फिरत कत, वन वन बनि बटमार।
6हरि कह"सावधान ओ गूजरि!, बोलिय वचन सँभार"।
7हौं “कृपालु” चखि लखिहौं दधि को, खाटो मीठो खार॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर दही का दान माँगते हुए सखी से कहते हैं कि अरी ओ दही की बेचने वाली ग्वालिन! मैं इस ब्रज का राजा हूँ तू नहीं जानती? ज्ञात होता है कि तू घोर गँवार है। अरी ग्वालिन! आदर सहित दही का दान दे दे, राजा से रार बढ़ाना ठीक नहीं। सखी ने श्यामसुन्दर को बनाते हुए कहा 'ब्रजराज की जय हो! ब्रजराज की जय हो!!'सरकार क्षमा करें! हम सचमुच ही नासमझ हैं किन्तु महाराज! मुझे यह आश्चर्य है कि राजाधिराज ब्रजराज के क्या ऐसे बुरे दिन आ गये हैं कि राजमहल छोड़कर आज कल वन-वन में भटकते हुए डकैती का व्यवसाय प्रारम्भ कर दिया है। श्यामसुन्दर ने कहा ओ गुजरी! सावधान होकर वचन संभाल कर बोल। 'कृपालु' के शब्दों में राजा होने के कारण मुझे अधिकार है कि मैं प्रत्येक दही बेचने वाली ग्वालिन के दही को खाकर यह देखूँ कि जनता में यह खट्टा दही बेचती है, या मीठा या नमकीन।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 307-308