# आजु हौं लरिहौं तो सन माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0320-M07-K052
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 52
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 148–149

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>आजु हौं लरिहौं तो सन माय।  
<a id="line-2"></a>जब जब हौं तो सन पूछत हौं, देति मंद मुसकाय।  
<a id="line-3"></a>सबै खिझावत"कारो"कहि मोहिं, हँसि करताल बजाय।  
<a id="line-4"></a>कोउ कहत"हम सुनी नंद जू, यमुना तट तोहिं पाय"।  
<a id="line-5"></a>"याको बाप न माय त्रिकालहुँ", इमि कहि हँस बलभाय।  
<a id="line-6"></a>सुनु लाला! तू मेरो जायो, दाउहिं बाबा जाय।  
<a id="line-7"></a>कारो रंग “कृपालु” राम को, जो भगवान कहाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

बालकृष्ण अपनी मैया से कहते हैं कि मैया! आज मैं डटकर तुझसे झगड़ा करूँगा। क्योंकि मैं जब जब तुझसे पूछता हूँ तू मंद-मंद मुस्कुरा देती है, बताती नहीं है। सभी लोग ताली बजा-बजाकर हँसते हुये मुझे 'कारो'ऐसा कह कर चिढ़ाते हैं। कोई कहता है कि हमने सुना है नंद जी ने यमुना के किनारे तुम्हें पड़ा हुआ पाया है। बलदाऊ भैया हँसकर यह कहते हैं कि इसके माता-पिता न कभी थे, न हैं न होंगे। मैया ने कहा कन्हैया वास्तविक बात तो यह है कि तुझको मैंने पैदा किया है एवं दाऊ भैया को तुम्हारे बाबा ने पैदा किया है। यह सुनकर ठाकुर जी को कुछ संतोष हो गया। इतने में ही 'कृपालु' ने व्यंगयोक्ति में श्यामसुन्दर से कहा कि काला रंग तो भगवान् राम का भी था फिर घबड़ाने की बात क्या है?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 313-314

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
