श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 38
भोर भइ जागो नवल किशोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhora bhai jāgo navalakishora!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भोर भइ जागो नवल किशोर।
2श्यामलगातहिं मात जगावति, नहिं जागत बरजोर।
3निज कर पकरि बिठावति पुनि पुनि, गिर्यो परत चितचोर।
4मूँदि नैन मधु बैन कहत हरि, अबहिं भई कहँ भोर।
5मैया कह,"टुक दृगन खोलि लखु"भैया कह झकझोर।
6"उठ उठ उठ रे कनुआँ अबहूँ, नींद गई नहिं तोर"।
7हरि “कृपालु” तब अरबराइ उठ, यशुमति लेति अँकोर॥
हिन्दी भावार्थ
सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है, 'हे कन्हैया! सबेरा हो गया जागो तो। मैया झकझोर झकझोर कर थक गयी किन्तु फिर भी हठीले श्यामसुन्दर नहीं जागे। तब मैया ने अपने हाथ से पकड़कर बार-बार बैठाया किन्तु फिर भी श्यामसुन्दर गिर पड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद आँख बन्द किये हुए ही श्यामसुन्दर ने प्यार भरी तोतली बोली से कहा-''अभी सवेरा कहाँ हुआ है।''इतने में बलदाऊ भैया ने जोरों से झकझोर कर कहा- अरे कनुआँ! उठ, उठ, उठ तेरी नींद अभी भी नहीं गयी, सवेरा हो गया।'''कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर अत्यन्त शीघ्र अड्बड़ाकर उठे एवं मैया की गोद में लिपट गये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 300-301