श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 37
कान्ह मम, जागो जीवन प्रान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha mama, jāgo jīvana prāna!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह मम, जागो जीवन प्रान।
2आयो भानु जगावन तो कहँ, देखु देखु उठु कान्ह।
3धनसुख मनसुख श्रीदामादिक, टेरत सुनहु सखान।
4जितनोइ मातु जगावति तितनोइ, लेत पीतपट तान।
5कह्यो जननि"जनि उठहु नवनि सब, दाउहिं दउँ जिय जान"।
6उठे “कृपालु” श्याम झुकि झूमत, चूमति मातु सुजान॥
हिन्दी भावार्थ
सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है कि मेरे प्राणप्यारे जागो। देखो, देखो, उठकर देखो तो तुमको सूर्य नारायण जगाने आये हैं। सुनो तो धनसुख, मनसुख श्रीदामादि सखागण तुम्हें पुकार रहे हैं। मैया अनेक प्रकार से जितना ही जगाने का प्रयत्न करती है श्यामसुन्दर उतनी ही पीताम्बर तानकर सो जाते हैं। खीझकर मैया ने कहा अच्छा पत उठ, में जा रही हूँ। अभी सारा मक्खन बलदाऊ भैया को दूँगी, तुम सोते ही रह जाओगे। 'कृपालु' के विचारानुसार मक्खन के लोलुप श्यामसुन्दर यह सुनते ही, झूमते एवं झुकते हुए उठे। मैया ने भी श्यामसुन्दर का आलिंगन, चुम्बन किया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 300