श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 36
बड़ी सी दुलहिनि माँगत लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bad̤ī sī dulahini māṁgata lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बड़ी सी दुलहिनि माँगत लाल।
2पीतांबरहुँ सँभारि सकत नहिं, छुटत छिनहिं छिन हाल।
3बोलत बोल तोतरिन बोलनि, बहत रहत मुख राल।
4भरत न पेट महरि घर घर घर, चोरत दधि ब्रजबाल।
5काउ चिर्हावत काउ बिरावत, काउहिं खैंचत बाल।
6कह “कृपालु” द्वापर ही आयो, जनु कराल कलिकाल॥
हिन्दी भावार्थ
छोटे से ठाकुरजी मैया यशोदा से बड़ी-सी दुलहिः माँग रहे हैं। अभी पीताम्बर तेक तो संभाल नहीं सकते हैं बार-बार गिरा पड़ता है। तोतली भाषा में बात करते हैं, मुँह रे राल बहती रहती है, और फिर करतूत यह है कि मैया-यशोद के घर में नौ लाख गाय होते हुए भी ब्रजांगनाओं के घर-घर में दूध-दही की चोरी करते फिरते हैं। किसी को चिढ़ाते हैं किसी को बिराते हैं एवं किसी के बाल खींचते हैं। "कृपालु कहते हैं आश्चर्य है कि इस द्वापर युग में ही कराल कलिकात् आ गया है जो कि पाँच वर्ष के लड़के ही दुलहिन के लिये हर कर रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 299