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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 35

पियत थन सुरभिन नंदकुमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piyata thana surabhina nandakumāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पियत थन सुरभिन नंदकुमार।

2इक थन पियत सुरभि-सुत इक थन, यशुमति-सुत बलिहार।

3दोउन महँ जनु होड़ परि गई, को जीतत को हार।

4अति द्रुत पियत जात पय पुनि पुनि, एकहिं एक निहार।

5प्रेम मगन सुरभिन दृग अरु थन, बह पय अरु पयधार।

6पुनि पुनि थन छुटि जात मुखन दोउ, पुनि पुनि निज मुख डार।

7लखत “कृपालु” नंद यशुमति दुरि, उर आनंद अपार॥

हिन्दी भावार्थ

छोटे से ठाकुरजी गायों के थन से मुँह लगाकर दूध पीते हैं, तत्सम्बंधी एक झाँकी का वर्णन है-एक गाय के एक थन को ठाकुरजी एवं दूसरे थन को बछड़ा पी रहा है। ऐसा लगता है कि जैसे उन दोनों में हार-जीत की होड़ लग गई है। वे दोनों अति शीघ्रता से अपने-अपने थन का दूध पीते जाते हैं एवं बार-बार ईर्ष्या भरी दृष्टि से एक दूसरे को देखते जाते हैं। बछड़े के प्यार से विभोर होकर गाय के शेष दोनों थनों से अपने-आप दूध बह रहा है एवं श्यामसुन्दर के प्यार से विभोर होकर गाय के दोनों नेत्रों से आनन्द की जलधारा बह रही है। अति शीघ्रता से दूध पीने के कारण दोनों के मुख से बार-बार थन छूट जाता है, किन्तु तत्काल ही पुनः थन मुख में डाल लेते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस मनोहर झाँकी को नन्द बाबा एवं यशोदा मैया छिप कर देख रहे हैं तथा आनन्द-विभोर हो रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 298-299