श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 34
परी है होड़ आजु दोउ भाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: parī hai hod̤a āju dou bhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1परी है होड़ आजु दोउ भाय।
2भोरे मुख तुतराय परस्पर, हरि हलधर बतराय।
3दोउ कह"नंद हमारोइ बाबा, यशुमति हमरिहिं माय"।
4नंद-यशोमति सुनति ओट ते, सो सुख बरनि न जाय।
5जब झगड़ो बढ़ि गयो नंद अरु, यशुमति ढिंग दोउ आय।
6छिन बैठत गोदिहिं नँद की दोउ, छिन यशुमति की धाय।
7इमि झगरत भइ बेर कह्यो तब, बाबा मृदु मुसकाय।
8बाबा माय वाय को जो दृग, मूँदि निरत कर गाय।
9उत दोउ करन लगे तिमि इत गये, बाबा माय लुकाय।
10लखि “कृपालु” बाँकी झाँकी यह, निज कहँ दियो लुटाय॥
हिन्दी भावार्थ
आज श्यामसुन्दर एवं बलराम में होड़ हो गयी है होड़ -में भोरे-भारे श्यामसुन्दर एवं बलराम परस्पर तोतल भाषा में बोलते हुए यह कहते हैं कि नन्द जी हमारे ही बान हैं, यशोदा जी हमारी ही मैया हैं, तुम्हारी नहीं। नन्द एः यशोदा दोनों की इन भोरेपन की बातों को सुनकर जो आनं पा रहे हैं वह वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। ज श्यामसुन्दर एवं बलराम का झगड़ा परस्पर बढ़ गया तब दोः निर्णय के लिए मैया एवं बाबा के पास आये। एक क्षण एः साथ ही, दोनों ही नंद की गोद में बैठ जाते हैं एवं दूसरे क्ष दोनों ही, एक साथ ही मैया की गोद में बैठ जाते हैं, इस प्रक जब इस दौड़ा-दौड़ी के झगड़े में बड़ी देर हो गयी, त मुस्कुरा कर बाबा ने कहा कि देखो भाई! हम दोनों तुम दो में से उसी के बाबा एवं मैया होंगे जो अपनी आँख ब करके, कुछ गाते हुए, नाच दिखाये। यह सुनकर उधर तो रे श्यामसुन्दर एवं बलराम उसी प्रकार आँख बन्द करके कुछ गाते हुए नाचने लगे और इधर 'जान बची लाखों पाये 'के सद्धान्तानुसार नंद एवं यशोदा कहीं जा कर छिप गये। श्री यामसुन्दर एवं बलराम आँख बन्द कर अकेले ही गाते नाचते ह गये। 'कृपालु' कहते हैं कि इस युगल झाँकी को देखकर नि अपने आपको न्यौछावर कर दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 297-298