श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 33
लली सँग खेलत बाल गुपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī saṁga, khelata bāla gupāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली सँग खेलत बाल गुपाल।
2खेलन के पूरब नटखट ने, चली अटपटी चाल।
3कह्यो लाल"जो खेलहिं हारे, दाउँ देय ततकाल।
4तुम हारो तो ब्याहु करहु मोहिं, जो हौं तो तोहिं बाल।
5जानि सकीं नहिं भानुदुलारी, कूट चाल नँदलाल।
6कह “कृपालु” मन ही मन धनिधनि, मायापति को जाल॥
हिन्दी भावार्थ
छोटे से श्यामसुन्दर छोटी सी किशोरी जी के साथ ल रहे हैं। खेल प्रारम्भ होने के पूर्व ही छलिया श्यामसुन्दर अपनी सनातन अटपटी चाल से कहा कि देखो भाई! खेल जो भी हारे उसे तत्काल दाँब देना पड़ेगा। दाँव यह रखा है म यदि तुम हारोगी तो तुम्हें मुझ से ब्याह करना पड़ेगा और दि मैं हारूँगा तो मैं तुमसे ब्याह करूँगा। नों प्रकार से हमारा तुम्हारा ब्याह हो जायगा) श्यामसुन्दर। इस चतुराई को भोरी भारी भानुदुलारी नहीं समझ सकी र उन्होंने खेल खेलना स्वीकार कर लिया। मन मायापति भगवान् के जाल की प्रशंसा करते हुए धन्य य कहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 296