श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 32
परी है होड़ नंद अरु माय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: parī hai hod̤a nanda aru māya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1परी है होड़ नंद अरु माय।
2दोउन कहत प्यार मोहन को, मोही ते बहुताय।
3निर्णय हेतु नंद अरु यशुमति, दोउ मोहन ढिग आय।
4दोउ वात्सल्य प्रेम-रस संयुत, दिय निज भुज फैलाय।
5मोहन नित की भांति यशोमति, गोदिहिं बैठ्यो जाय।
6गयेउ नंद खिसियाय हार लखि, रहेउ नैन जल छाय।
7परम कौतुकी श्याम नंद के, उर महँ प्रकट्यो जाय।
8प्रकटत नँदनंदन नँद को निज, गोदिहिं पर्यो लखाय।
9अंतर्धान भये उत यशुमति, गोदिहिं तजि मुसकाय।
10कह “कृपालु” सुनु मातु यशोमति, याय न कोउ पतियाय॥
हिन्दी भावार्थ
आज बाबा नंद एवं मैया यशोदा में प्रेम की होड़ लगी हुई है। दोनों कहते हैं कि श्यामसुन्दर मुझसे ही सबसे अधिक प्यार करते हैं। इसके निर्णय के लिए नन्द एवं मैया यशोदा दोनों श्यामसुन्दर के पास आये। दोनों ने यह प्रथम ही निश्चय कर लिया था कि श्यामसुन्दर से बिना कुछ कहे ही अपने हाथों को फैला दिया जाय। तदनुसार दोनों ने अपने रोम-रोम में वात्सल्य प्रेम भर कर अपनी-अपनी विजय की आकांक्षा से अपनी अपनी भुजाओं को फैला दिया। बालकृष्ण बाल लीला का अभिनय करते हुए नित्य की भाँति मैया यशोदा की गोदी में जाकर बैठ गये। नन्द ने अपनी हार मान ली एवं खिसिया गये। उनकी आँखों में पानी भर आया। सर्वान्तर्यामी श्यामसुन्दर नन्द के हृदयस्थ भावों को पहिचान कर योगमाया की शक्ति से उनके हृदय में प्रकट हो गये। जिसके परिणाम स्वरूप नन्द को ऐसा अनुभव हुआ कि श्यामसुन्दर मेरी ही गोद में बैठे हैं। उधर पशोदा के हृदय में, जीत जाने के कारण, अहंकार का अंकुर पैदा ही गया, जिसको मिटाने के लिए श्यामसुन्दर मुस्करा के उनकी वोद से अलक्षित हो गये। इस प्रकार दोनों की हार एवं दोनों की ही जीत सिद्ध हो गयी। इसी बीच 'कृपालु' ने जाकर मैया गशोदा के कान में चुपके से कहा कि इस छलिया को कोई भी भपना न समझे अर्थात् अपना समझने का मिथ्याहंकार न करे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 295-296