श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 31
गोद-हित झगरत सुंदर श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: goda-hita jhagarata sundara shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गोद-हित झगरत सुंदर श्याम।
2अंबर पकरि महरि को दृग झरि, लावत पटकत पाम।
3अति अधीर मुख-मातु लखत सो, जाति करन गृह काम।
4कर सों कर अंबरहिं छुटावति, करति हाय, ब्रज बाम।
5इमि दोउ लरत लखत मुनि नारद, ठड़े ठगे तेहि ठाम।
6नारद चकित कहत"धनि भामिनि, धनि धनि गोकुल ग्राम"।
7कत “कृपालु” इतराति नंद कह, लै ले री सुखधाम॥
हिन्दी भावार्थ
(मैया किसी गृहकार्य के लिये घर जा रही है। बालकृष्ण चाहते हैं कि मैया मुझे गोद में लेले, इस विषय में माँ-बेटे का प्रेम-युद्ध हो रहा है।) बालकृष्ण मैया की गोद में जाने के लिए झगड़ रहे हैं। मैया खड़ी है, बालकृष्ण उनके कपड़े पकड़े हुए, पैर पटकते हुए, आँखों से आँसुओं की झड़ी लगाते हुए रो रहे हैं एवं अत्यन्त अधीर होकर मैया के मुख की ओर देख रहे हैं (ताकि मैया पुत्रकी आँख से आँख मिलाकर वात्सल्य प्रेम में विभोर होकर श्रीकृष्ण को गोद में ले ले) किन्तु मैया किसी आवश्यक कार्य से घर जाना चाहती है। अतएव मैया अपने हाथ से अपने लाल के हाथ को अपने कपड़े से बार-बार छुड़ाने का प्रयत्न करती है, जिसे देखकर ब्रज-गोपियाँ कहती हैं-हाय! हाय! मैया लाला को क्यों रुला रही है? गोद में ले ले। इस प्रकार इन दोनों को वात्सल्य प्रेम में लड़ते हुए देवर्षि नारद ने भी देखा-यों देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ से होकर ठगे से वहीं खड़े रह गये। (नारदजी को आश्चर्य यह था कि ब्रह्म जीव की गोद में जाना चाहता है किन्तु जीव उसे डाँट रहा है। धन्य है इस वात्सल्य-प्रेम को!) नारद जी आश्चर्य में पड़कर कहते हैं मैया तुझको धन्य है एवं इस गोकुल ग्राम को भी धन्य है, जहाँ यह अलभ्य रस लुट रहा है।''कृपालु' कहते हैं कि इतने में ही नन्दजी आ गये और उन्होंने कहा कि अरी! क्यों बहुत इतरा रही है। लाला को ले ले ना, काम फिर कर लेना।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 293-294