श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 30
हमारो भोरो भारो कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro, bhoro bhāro kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो भोरो भारो कान्ह।
2पूछत मातु यशोमति ते हरि, करि तुतरिन बतियान।
3तू मैया! मेरी मैया है, याको कहा प्रमान।
4याही पूछन हित मोहिं पठयो, हलधर सहित सखान।
5पूछहु कान्ह बबा सों अपने, बाबा सुनि मुसकान।
6बाबा कह"यह मैया तेरी, हौं बाबा सच मान।
7जो न मान तेहि पठवहु मो ढिग, समुझैहौं विधि आन"।
8हम “कृपालु” येहि भोरेपन पर, वारत कोटिन प्रान॥
हिन्दी भावार्थ
यशोदा मैया कहती हैं कि हमारे प्यारे कन्हैया अत्यन्त हीं भोरे हैं। श्यामसुन्दर तोतली भाषा में बात करते हुए मैया यशोदा से पूछते हैं कि हे मैया! तू मेरी मैया है इसमें क्या प्रमाण है? यही पूछने के लिये दाऊ भैया एवं अन्य सखाओं ने मुझे तेरे पास भेजा है। मैया ने कहा, लाला! यह तो तू अपने बाबा से पूछ ले। मुस्कराते हुए नन्द बाबा ने श्याम सुन्दर से कहा कि हे श्यामसुन्दर! यह सत्य बात है कि यह तेरी मैया है और मैं बाबा हूँ। जो लड़का मेरे इस कहने को न माने उसे हमारे पास ले आना। मैं उसे और प्रकार से (पीट-पाट कर) समझा दूँगा। कृपालु' कहते हैं कि श्री श्यामसुन्दर के इस भोलेपन पर हम अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 293