# हमारो भोरो भारो कान्ह।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0298-M07-K030
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 30
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 138–138

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारो भोरो भारो कान्ह।  
<a id="line-2"></a>पूछत मातु यशोमति ते हरि, करि तुतरिन बतियान।  
<a id="line-3"></a>तू मैया! मेरी मैया है, याको कहा प्रमान।  
<a id="line-4"></a>याही पूछन हित मोहिं पठयो, हलधर सहित सखान।  
<a id="line-5"></a>पूछहु कान्ह बबा सों अपने, बाबा सुनि मुसकान।  
<a id="line-6"></a>बाबा कह"यह मैया तेरी, हौं बाबा सच मान।  
<a id="line-7"></a>जो न मान तेहि पठवहु मो ढिग, समुझैहौं विधि आन"।  
<a id="line-8"></a>हम “कृपालु” येहि भोरेपन पर, वारत कोटिन प्रान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

यशोदा मैया कहती हैं कि हमारे प्यारे कन्हैया अत्यन्त हीं भोरे हैं। श्यामसुन्दर तोतली भाषा में बात करते हुए मैया यशोदा से पूछते हैं कि हे मैया! तू मेरी मैया है इसमें क्या प्रमाण है? यही पूछने के लिये दाऊ भैया एवं अन्य सखाओं ने मुझे तेरे पास भेजा है। मैया ने कहा, लाला! यह तो तू अपने बाबा से पूछ ले। मुस्कराते हुए नन्द बाबा ने श्याम सुन्दर से कहा कि हे श्यामसुन्दर! यह सत्य बात है कि यह तेरी मैया है और मैं बाबा हूँ। जो लड़का मेरे इस कहने को न माने उसे हमारे पास ले आना। मैं उसे और प्रकार से (पीट-पाट कर) समझा दूँगा। कृपालु' कहते हैं कि श्री श्यामसुन्दर के इस भोलेपन पर हम अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 293

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
