श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 29
रूठे कान्ह मनावति माय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rūṭhe kānha manāvati māya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रूठे कान्ह मनावति माय।
2झूठेहिं रोदन ठान मान गहि, लोटत पग पटकाय।
3पुनि उठि खीझि रेनु-तनु-मंडित, कछुक दूरि चलि जाय।
4प्रेम-मगन मन ही मन यशुमति, पकरति कर गहि धाय।
5पूछत मातु काह तुम लेइहौं, काहे धूम मचाय।
6हरि “कृपालु” कह तोतरि बोलनि, मोहिं दुलहिनि देउ लाय॥
हिन्दी भावार्थ
( श्रीकृष्ण आज किसी कारण से रूठकर बैठे हुए हैं। बालकृष्ण रूठे हुए हैं एवं मैया मना रही है। बालकृष्ण अकारण ही अत्यधिक रोने का नाटक कर रहे हैं, साथ ही भूमि पर पैर पटकते हुए लोट भी रहे हैं। जब मैया उनके पास मजाने नहीं जातीं, वह तुरन्त ही उठकर खीझे हुए से समस्त शरीर में धूल लपेटे हुए एवं पैर पटकते हुए, कुछ बड़बड़ाते हुए थोड़ी दूर तक भागे चले जाते हैं। मैया वात्सल्य प्रेम में विभोर होकर मन-ही-मन हर्ष से फूली नहीं समाती और विवश होकर दौड़कर पकड़ लेती है तथा बड़े प्यार से पूछती है, "क्यों लाला! आखिर क्यों आसमान सिर पर उठा रखा है? बताओ तो सही क्या लोगे? 'कृपालु' कहते हैं कि तब बालकृष्ण ने अवसर देखकर तोतली भाषा में कहा-'मैया!! मुझे दुलहिन ला दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 292-293