श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 28
अरी मोरे, ललना सों कौन लरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī more, lalanā soṁ kauna larī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी मोरे, ललना सों कौन लरी।
2या ललना के कमलानन पर, वारत हौं सबरी।
3चलु री माय! पतियाय न जो तू, जाय न कहुँ भज री।
4देखु मातु! सोइ गोरी गोरी, भोरी, बनि जु खरी।
5तू तरुणी काकी जाई क्यों, ललना की भुज पकरी।
6सिसक सिसक मेरो कान्हा रोवत, तू मुसकात खरी।
7यह तो माय कछु न्याय न कीनो, निज सुत ओर धरी।
8मन “कृपालु” सोचति राधे"कब, खबर लेउँ तुम्हरी"॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकृष्ण एवं श्री राधिका परस्पर खेलते हुए झगड़ा करते हैं। किशोरी जी ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ कर कहा 'दाँव दिये जाओ।'इस पर श्रीकृष्ण रोते हुए मैया के पास गये तथा मैया से शिकायत की। मैया अत्यन्त क्रोध में श्रीकृष्ण का पक्ष लेती हुई कहती हैं।) अरी! वह कौन सी छोरी है जिसने मेरे छोरे को तंग किया है। मैं इस अपने भोले-भाले लाला के कमल-मुख पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा, "मैया! यदि तुझे मेरी बात का विश्वास न हो तो मेरे साथ चल, मैं उस छोरी को दिखा दूँ। जल्दी चल, नहीं तो वह भाग जायगी।'कुछ दूर चलकर श्रीकृष्ण ने कहा, "देख मैया! उधर वह जो बीच में गोरी-गोरी छोरी अत्यन्त ही भोरी बनकर खड़ी है, उसी ने मुझे मारा है।'मैया ने डाँटते हुए कहा, 'क्यों री। युवती तू किसकी बेटी है और तूने मेरे लाल का हाथ क्यों पकड़ा? मेरा लाल अभी तक हिचकियाँ भर-भर कर रो रहा है और तू खड़ी खड़ी मुस्करा रही है।'किशोरी जी ने कहा, 'मैया! तूने बिना मेरी बात सुने पक्षपातपूर्ण निर्णय दिया है, मेरी भी तो सुन लेती।'"कृपालु"कहते हैं कि किशोरी जी मन-ही-मन खीझती हुई सोच रही हैं कि मैं कब अवसर पाकर तुम्हारी खबर लूँ अर्थात् मैं भी इसी प्रकार झूठी शिकायत अपनी मैया से करूँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 291-292