# अरी मोरे, ललना सों कौन लरी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0296-M07-K028
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 28
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 137–137

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरी मोरे, ललना सों कौन लरी।  
<a id="line-2"></a>या ललना के कमलानन पर, वारत हौं सबरी।  
<a id="line-3"></a>चलु री माय! पतियाय न जो तू, जाय न कहुँ भज री।  
<a id="line-4"></a>देखु मातु! सोइ गोरी गोरी, भोरी, बनि जु खरी।  
<a id="line-5"></a>तू तरुणी काकी जाई क्यों, ललना की भुज पकरी।  
<a id="line-6"></a>सिसक सिसक मेरो कान्हा रोवत, तू मुसकात खरी।  
<a id="line-7"></a>यह तो माय कछु न्याय न कीनो, निज सुत ओर धरी।  
<a id="line-8"></a>मन “कृपालु” सोचति राधे"कब, खबर लेउँ तुम्हरी"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण एवं श्री राधिका परस्पर खेलते हुए झगड़ा करते हैं। किशोरी जी ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ कर कहा 'दाँव दिये जाओ।'इस पर श्रीकृष्ण रोते हुए मैया के पास गये तथा मैया से शिकायत की। मैया अत्यन्त क्रोध में श्रीकृष्ण का पक्ष लेती हुई कहती हैं।) अरी! वह कौन सी छोरी है जिसने मेरे छोरे को तंग किया है। मैं इस अपने भोले-भाले लाला के कमल-मुख पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा, "मैया! यदि तुझे मेरी बात का विश्वास न हो तो मेरे साथ चल, मैं उस छोरी को दिखा दूँ। जल्दी चल, नहीं तो वह भाग जायगी।'कुछ दूर चलकर श्रीकृष्ण ने कहा, "देख मैया! उधर वह जो बीच में गोरी-गोरी छोरी अत्यन्त ही भोरी बनकर खड़ी है, उसी ने मुझे मारा है।'मैया ने डाँटते हुए कहा, 'क्यों री। युवती तू किसकी बेटी है और तूने मेरे लाल का हाथ क्यों पकड़ा? मेरा लाल अभी तक हिचकियाँ भर-भर कर रो रहा है और तू खड़ी खड़ी मुस्करा रही है।'किशोरी जी ने कहा, 'मैया! तूने बिना मेरी बात सुने पक्षपातपूर्ण निर्णय दिया है, मेरी भी तो सुन लेती।'"कृपालु"कहते हैं कि किशोरी जी मन-ही-मन खीझती हुई सोच रही हैं कि मैं कब अवसर पाकर तुम्हारी खबर लूँ अर्थात् मैं भी इसी प्रकार झूठी शिकायत अपनी मैया से करूँगी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 291-292

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
