श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 27
लली सँग खेलत हार्यो लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī saṁga, khelata hāryo lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली सँग खेलत हार्यो लाल।
2हारत ही भाज्यो पै लाली, पकर्यो कर गोपाल।
3लली कह्यो कित भज्यो लला अब, दाउँ देउ ततकाल।
4सक्यो छुड़ाय न जब कर तब हरि, ठान्यो रोदन-जाल।
5लली छाँड़ि कर कही"जाहु अब, जनि आयो पुनि काल"।
6जाय “कृपालु” कह्यो मैया सों, मोहिं मार्यो इक बाल॥
हिन्दी भावार्थ
छोटे से कन्हैया छोटी सी किशोरी जी से खेल में हार गये। हारते ही भागने लगे, किन्तु किशोरी जी ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा 'कहाँ भागे जा रहे हो, दाँव देकर तब जाओ '। अत्यन्त प्रयत्न करने पर भी जब श्यामसुन्दर हाथ न छुड़ा सके तब खिसिया कर रोने लगे। रोते हुए श्यामसुन्दर के हाथ को छोड़ कर किशोरी जी ने कहा कि जाओ कल से हमारे साथ खेलने मत आना। कृपालु 'के शब्दों में श्यामसुन्दर और भी खीझ गये एवं किशोरी जी के विरुद्ध खूब बढ़ा-चढ़ा कर मैया से यह कहा कि मुझे एक बालिका ने आज बहुत मारा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 290